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Tuesday, April 27, 2010

फुलकारी



हर वक्त मुनासिब होता है
मंज़र मनमाफ़िक होता है
बढ़ने वाले कब रुकते हैं
मुश्किल जीवन का सौदा है
सुख पल दो पल का धोखा है
जो उठता है और लडता है
ये वक्त उसी का होता है
लक्ष्य वही हासिल करता है
जो पहला कदम बढ़ता है
डरपोक किनारे रहता है
तैराक नदी तर जाता है
दिल बाग-बाग हो जाता है
बागों में छाए हरियाली
फूलों को भी पड़ता शर्ममाना
जब हसें हमारी फुलकारी

Sunday, April 25, 2010

रंग




जिंदगी है एक कैनवास
सपने हैं रंग
ख्वाहिशों की ऊंचाईयां
हक़ीकत की जंग
बहुत हंसी है हर पल
क्योंकि तुम हो मेरे संग
तुम सांसों में, तुम धड़कन में
तुम आंखों में, तुम ही मन में
तुम सुबह में, तुम शामों में
तुम बातों मे, तुम रातों में
तुम ही तो हो जज्बातों में,
तुम गीत हो, संगीत हो
हर तूफां में, हर मुश्किल में
तुम ही तो मेरी जीत हो
तुम हवा हो, तुम पानी हो
सच्चे शायर की ग़ज़ल हो जैसे
तुम हर पल नई कहानी हो
जमुना तट पर बजती बंसी
मंदिर में बजती घंटी हो
कोई भी लट्टू हो जाए
जब मंद-मंद तुम हंसती हो
माशूका ऐसी सब चाहें
जिसमें इतनी सब ख़ूबी हो
मैं खुशनसीब, तुम मेरी हो
मेरी जानम, मेरी बीवी हो
पर याद रहे इन रिश्तों में भी
पहचान नहीं अपनी खोना
तुम मुझसे हो, तो तुमसे मैं हूँ
तुझसे ही है मेरा होना
जीवन जीने की आपाधापी में
ना ख़ुद को तुम खोने देना
हम सबको साबित करना है
अपना-अपना मानव होना
हम साथ हैं, कुछ कर पाऐंगे
हर मुश्किल से लड़ जाऐंगे
मशहूर हुए लोगों में एक दिन
अपनी भी जगह बनाऐंगे
जब मैं हूंगा साठ बरस का
और तुम होगी तिरपन की
एक दूजे में खो जाऐंगे
बातें करते बचपन की
छोड़ो-छोड़ो इतनी लंबी
बातें करें आजकल की
काम बहुत है, चिंता लग गयी
फिर महिने के वेतन की
इसलिए छोड़ बातें बेकार की,
बोलो हाथी घोड़ा पालकी, जै कन्हैया लाल की।

मानवता सिखलाएं



बिल्ली कहती म्याऊँ-म्याऊँ
रुक जा चूहे अब मैं आऊँ
तुझको मैं खा जाऊँगी
अपनी भूख मिटाऊँगी
फिर जल्दी से पेड़ पे चढ़के
चुपके से सो जाऊँगी
चूहा बोला बिल्ली मौसी
तुम तो कितनी प्यारी हो
हमको खाकर क्या पाओगी
तुम तो राजदुलारी हो
हमें मारकर पछताओगी
वापस घर कैसे जाओगी
जिस राह से तुमको जाना है
वहां बैठा कुत्ता मामा है
वो तुमको खा जाएगा
फिर तुम्हें कौन बचाएगा
आओ मिलकर रहना सीखें
दूजे का दुख भी सहना सीखें
फिर ना कोई डरेगा तुमसे
इज्ज़त तुमको देगा दिल से
साथ में हम सब खाऐगें
झूमें-नाचे-गाऐंगे
आपस में लड़ते इंसानों को
मानवता सिखलाऐंगे।

Friday, April 23, 2010

पाखी



जब नदी किनारे बैठा कोई
अंतर्मन को खोजे फंसा कोई हो अंतर्द्वन्द में,
राह ना कोई सूझे तने भवें, चेहरा गुस्से से
लाल तमतमा जाए
मुट्ठी भींचे, दांत पीसकर
सूरज को घूरे जाए
जब हो हताश, वो हो निराश और दिल घबरा जाए
वो हो बेचैन, मन व्याकुल हो
पर राह नज़र ना आए
तब चुपके से, तब धीरे से
फर्र-फर्र सी पाखी आए
एक झटके में, एक पल में वो
सारी चिंता हर जाए
वो मंद-मंद, हौले-हौले उस बरगद के
पत्तों पे रुक जाए
फिर पलकें बंद हो जाए
कूके पाखी, तुम्हें सपनों की
दुनियां में ले जाए
पंखों की होडा-होडी से
तुम्हें गगन सैर करवाए
चाहे हो कितना दूर क्षितिज
वो हवा से पेच लडाए
वो रुके नहीं, वो थके नहीं
बस उडती–उडती जाए
तुम्हें राह मिले अपनी मंज़िल की
हर इच्छा पूरी हो जाए
हर झोंका संचार करे
हर अंतर्द्वंद मिट जाए
फिर आए एक पवन हिलोरा और
नींद तेरी उड जाए
अब हर मुश्किल आसां सी दिखे
कोई कष्ट नज़र ना आए
मन केवल इतना चाहे
जीवन में सबके तू पाखी
एक नया सवेरा लाए