Friday, August 13, 2010

अपने ही नत्था को देखने नहीं पहुंचे कलाकारों के शुभचिंतक



अपनी रिलीज़ से पहले ही चर्चित हो चुकी फ़िल्म ‘पीपली लाइव’ दर्शकों को जुटा पाने में नाक़ामयाब रही। पूरे देश की तो कह नहीं सकते लेकिन कम से कम छत्तीसगढ की राजधानी रायपुर में तो फ़िल्म दर्शकों के अभाव में‘चारो खाने चित’ नज़र आई। दर्शकों का आलम यह रहा कि फ़िल्म के पहले दो शो में महज़ दो दर्जन लोग ही सिनेमा हाल में नज़र आए।

अपने ओंकार, और हमारे नत्था के नाम से बडी-बडी शेखियां बघारते तथाकथित रंगकर्मी शुभचिंतक तक फ़िल्म को देखने सिनेमा हाल तक नहीं पहुंचे। वो लोग जो कलाकारों के हितों की आवाज़ उठाने का दंभ भरते हैं, उन तक ने फ़िल्म को देखना गंवारा नहीं किया। अब इसे फ़िल्म की कमी कहा जाए या उन ठेकेदारों का उदासीन रवैया इसका फैसला आप ख़ुद ही करें तो बेहतर है।

वैसे आपको एक बात बता दें कि फ़िल्म हर तरह से एक उत्कृष्ठ निर्माण कही जा सकती है। फ़िल्म अंत तक दर्शकों को बांधे रखती है और सबसे बडी बात यह है कि कहीं भी फ़िल्म की गति को धीमा नहीं पडने देती। जहां तक बात है ओंकार दास मानिकपुरी की तो उसकी तारीफ़ तो फ़िल्म के निर्माता, एक सफ़ल और सक्षम अभिनेता आमिर खान खुद कर चुके हैं जिसे किसी भी हाल में अतिश्योक्ति नहीं कहा जा सकता।

निर्देशिका के कुशल निर्देशन ने कहीं भी यह ज़ाहिर नहीं होने दिया कि यह उनकी पहली फ़िल्म है और इससे पहले वे फ़िल्म जगत से सीधे नहीं जुडी रहीं है। ग़ौरतलब है कि फ़िल्म पहले ही ‘डरबन फ़िल्म समारोह’ में सर्वश्रेष्ठ फीचर फ़िल्म का पुरस्कार जीत चुकी है।

8 comments:

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

आज पहला दिन है भाई, आगे देखते हैं, नत्‍था के प्रेमी टाकीज़ पहुचते हैं कि नहीं.

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

जहां तक मेरा मानना है कि भीड़ बढ़ाने की परवाह नया थिेयेटर के लोगों में कभी नहीं रही.

रवीन्द्र गोयल said...

धन्यवाद, संजीव भाई लेकिन थियेटर और फ़िल्म में शायद इसका कुछ फर्क तो पडता है ...। मैं उन लोगों की बात ही आज नहीं करना चाहता जिनकी पहली ही फ़िल्म अच्छी होने के बावजूद नहीं चली और वे कहीं ग़ुमनामी के अंधेरे में गुम होकर रह गए।

हमारी दुआ यही है कि हमारे कलाकारों को कम से कम यह महसूस नहीं होना चाहिए कि उनके घर में ही उनको वो सहयोग नहीं मिला जिसकी उन्हें अपेक्षा थी। ऐसे में कम से कम उन लोगों को तो पहुंचना ही चाहिए था जो ज़ोर-ज़ोर से कलाकारों के शोषण और हक़ों की बातें करते हैं। वैसे आप मुझ से ज़्यादा अच्छी तरह जानते हैं कि किसी भी फ़िल्म की ओपनिंग के मायने क्या होते हैं ?

हम भी यही दुआ करते हैं कि लोग देखें और इन कलाकारों को प्रोत्साहन मिले।

'उदय' said...

... सार्थक अभिव्यक्ति ... जरुर देखेंगे !!!

संजय भास्कर said...

हम यही दुआ करते हैं कि लोग देखें और इन कलाकारों को प्रोत्साहन मिले।

Rahul Singh said...
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Rahul Singh said...

मैंने अच्‍छी खासी भीड़, कुछ शोर-शराबे और एकाध सीटी के बीच फिल्‍म देखी. शुभचिंतक होने, होने की खबर बनने और उनकी खबर लेकर खबरदार करने के लिए बधाई. मुझे लगा की फिल्‍म की लंबाई विदेशों में प्रदर्शन के अनुरूप संपादित कर दी गई है, जिससे मंहगाई डायन थिगड़ा सा लगता है, मिट्टी खोदने वाली की मौत की संजीदगी में थोड़ा कुछ छूट गया जान पड़ता है और फिल्‍म में मीडिया की करामात असंतुलित उभर गया है, जो शायद लक्ष्‍य नहीं था. फिल्‍म के असरदार होने में तो कोई दो राय नहीं है. अभिनय से कहीं अधिक पात्रों के चयन में कमाल दिखता है. आदेश का पालन करने वाले, कर्तव्‍यनिष्‍ठ, निष्काम कर्मयोगी बीडीओ साहब को याद करें.

Sanjeet Tripathi said...

mujhe nahi maloom sir ki kab aap raipur aa kar film dekh gaye... jo aisa likha hai.....

actualy jab yah film aai to chhattisgarh me sirf multiplex me hi lagi, raipur me koi bhi cinema hall khali nahi tha... raipur me yah adlabs me lagi.... aisa bhi khali nahi tha jaisa aap bataa rahe hain....

baki aapke source jaanein....