Monday, August 16, 2010

ब्रांड बन गए हैं आमिर खान



एक बिज़नेस चैनल पर एक सफ़ल उद्योगपति से बातचीत देख रहा था जिसमें उन्होनें कहा था कि “एक नाम को ब्रांड बनाने में बहुत मेहनत लगती है और उससे भी ज़्यादा मशक्कत करनी पडती है उसे बनाए रखने में, कई बार तो ज़िन्दगी लग जाती है”। कार्यक्रम देखते हुए लगा कि बडे लोग हैं, बडी-बडी बातें करते ही हैं। जब आमिर ख़ान प्रोडक्शन की नई फ़िल्म “पीपली लाइव” देखी तो लगा कि उसमें कितनी सच्चाई है। आज आमिर खान का नाम फ़िल्म की सफ़लता की गारंटी बनता जा रहा है। कभी अलग-अलग परिस्थितियों की वजह से इसमें चूक भी हो सकती है लेकिन कम से कम इसमें चूक नहीं होती कि फिल्म बेहतर बनी होगी और इसकी गुणवत्ता और संवेदनशीलता को लेकर किसी तरह की कोई कोताही नहीं बरती गई होगी।

आमिर ख़ान का नाम शायद इसी लिए आज एक ब्रांड की तरह स्थापित हो गया है। फिर चाहे वो प्रोड्युसर के तौर पर ही क्यों ना जुडा हो। ऐसे में फ़िल्म से दर्शकों की उम्मीदें बढ जाना स्वभाविक है। ‘पीपली लाइव’ भी कहीं ना कहीं यही साबित करती है कि एक साधारण सी कहानी को भी अगर अच्छे से फिल्माया जाए तो वो दर्शकों का ना केवल मनोरंजन करती है बल्कि निर्देशक द्वारा दिया जाने वाला संदेश भी उन तक पहुंचाती है।

फिल्म का प्रमुख किरदार नत्था दरअसल उन किसानों का प्रतिनिधित्व करता है जो परिस्थितियों के आगे अपने को बेबस महसूस करते हैं और अंत में आत्महत्या करने को मजबूर हो जाते हैं। इस झूठी उम्मीद के साथ कि शायद इसके बाद उनके परिवारवाले सुखी रह पाएँ।

फ़िल्म कहीं नौकरशाही और राजनीति पर प्रहार करती है तो दूसरी ओर टीआरपी की आपा-धापी के नशे में चूर मीडिया की कार्यप्रणाली पर भी प्रश्न चिन्ह लगाती है। जिनकी जल्दबाज़ी में समाज की बुरी खबरें तो सुर्खियों में छाई रहती हैं लेकिन इस बीच ज्वलंत मुद्दे कहीं पीछे छूट जाते हैं। फिल्म में समाज की सामाजिक और राजनितिक समस्या को बहुत ही सटीक ढंग से दिखाया गया है। बेटे द्वारा अपने पिता को आत्महत्या करने के लिए कहना, मनोरंजन नहीं करता बल्कि एक विडम्बना को प्रदर्शित करता है।

फिल्म का इतना प्रचार किया गया है कि यह फिल्म, बडी फिल्मों की श्रेणी में आ गई है भारत में पीपली लाइव के छह सौ प्रिंट तथा अन्य देशों में सौ प्रिंट रिलीज किए गए। यह बात ध्यान देने बाली है कि बगैर किसी स्टार के सात सौ प्रिंट के साथ पीपली लाइव रिलीज की गई और टीवी चैनलों पर दिखाई जा रही ख़बरों के मुताबिक फ़िल्म ने पिछले दो दिन में ही सात करोड का बिज़नेस कर लिया है। बताया जाता है कि फ़िल्म के सेटेलाइट और संगीत अधिकार बेचकर आमिर पहले ही करीब पंद्रह करोड रुपये जुटा चुके हैं। ग़ौरतलब यह भी है कि फ़िल्म की लागत दस करोड रुपये बताई जा रही है।

‘पीपली लाइव’ दरअसल एक वैचारिक और राजनीतिक फिल्म है। कहने को तो भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता है, लेकिन किसानों की माली हालत बहुत खराब है। उनके लिए कई योजनाएँ बनाई जाती हैं, लेकिन उन तक पहुँचने के पहले ही योजनाएँ दम तोड़ देती हैं। आज भी अलग-अलग प्रदेशों से हर साल खेती छोड़कर लाखों किसान जीविका उपार्जन और अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए पलायन करते हैं।

सरकारें चाहे जितना पलायन से इंकार करे और विकास के जितने भी बडे-बडे दावे करें लेकिन उनकी पोल उस वक्त खुल जाती है जब पलायन किए हुए किसान या दूसरे निरीह लोग किसी कारणवश वापस आते हैं। उस समय अपनी राजनैतिक रोटियां सेकनें यही नेता उनके पास जाते हैं और एक बार फिर घोषणाएं कर आते हैं। उन मजबूरों के साथ तस्वीरें खिंचवाते हैं और वहां चंद सिक्के छोडकर हमदर्दी जता आते हैं। हमारे नेतागण फिर से भूल जाते हैं कि चंद दिनों की रोटियों का इंतज़ाम तो कर आए लेकिन उन्हें रोज़गार मुहैया आज भी नहीं करवाया? शायद इतना सोचने की फुर्सत ही कहां होती है।

अपने ही मुंह अपना गुणगान करने वाले ये नेतागण भूल जाते हैं कि जिस प्रदेश की जनसंख्या यह लोग दोण करोड दस लाख बताते हैं उसी के 36 लाख परिवारों को गरीबी रेखा के नीचे बताकर एक रुपये और दो रुपये किलो में चावल उपलब्ध करवाने का गुणगान ख़ुद ही करते हैं। ऊपर से यह दंभ भी भरते हैं कि प्रदेश की औसत आय दस हज़ार से ऊपर है। शायद यह भूल जाते हैं कि जनता इतनी भी बेवकूफ नहीं है साहब, वो सब जानती है कि अगर एक औसत परिवार में चार लोग भी माने जाएं तो इन्हीं के आंकडों के मुताबिक करीब डेढ करोड की जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे जीती है। ऐसे में कैसे विकास की बात करते हैं यह लोग? इसी तरह नत्था का व‌र्त्तमान हमें झकझोरता है।

यह फिल्म भारत के गरीब लोगों के दुखद जीवन और पलायन की गाथा है जिस पर राजनीतिक रोटियां सेंकनेवालों की कमी नहीं है। नेता, नौकरशाह, बिचौलिए, सरकारी बाबू, मीडिया और आसपास के लोग सभी अपने-अपने लाभ की जुगत में रहते हैं। कई कलाकारों द्वारा तैयार किया फिल्म का संगीत, भारतीय लोकसंगीत और लोकगीतों की मीठी चाशनी कानों में घोल देता है। संवाद बहुत ही सरल-सहज और स्वभाविक हैं शायद इसलिए गहरा प्रभाव पैदा करते हैं।

आप भी अगर अपने विचार देंगे तो हमें विषयों को समझने में मदद मिलेगी। आपकी प्रतिक्रिया हमारे लिए महत्वपूर्ण होती हैं।

2 comments:

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

भाई, ताजा समाचार यह है कि इस कामयाबी के बावजूद नत्‍था को आज भी मुफलिसी में ही जीना है, हॉं चार दिनों आमीर के साथ रहने की गर्मी और नशा अभी छाया है उसके बाद उसे अपने और अपने परिवार के लिए रोटी बटोरना है।


पढ़ें सत्‍य को उद्घाटित करने वाली पत्रकार आाशा शुक्‍ला को वसुन्‍धरा सम्‍मान

छत्तीसगढ मीडिया क्लब said...

सुन्दर पोस्ट, छत्तीसगढ मीडिया क्लब में आपका स्वागत है.