Sunday, April 25, 2010

मानवता सिखलाएं



बिल्ली कहती म्याऊँ-म्याऊँ
रुक जा चूहे अब मैं आऊँ
तुझको मैं खा जाऊँगी
अपनी भूख मिटाऊँगी
फिर जल्दी से पेड़ पे चढ़के
चुपके से सो जाऊँगी
चूहा बोला बिल्ली मौसी
तुम तो कितनी प्यारी हो
हमको खाकर क्या पाओगी
तुम तो राजदुलारी हो
हमें मारकर पछताओगी
वापस घर कैसे जाओगी
जिस राह से तुमको जाना है
वहां बैठा कुत्ता मामा है
वो तुमको खा जाएगा
फिर तुम्हें कौन बचाएगा
आओ मिलकर रहना सीखें
दूजे का दुख भी सहना सीखें
फिर ना कोई डरेगा तुमसे
इज्ज़त तुमको देगा दिल से
साथ में हम सब खाऐगें
झूमें-नाचे-गाऐंगे
आपस में लड़ते इंसानों को
मानवता सिखलाऐंगे।

2 comments:

Rakesh Derhgawen said...

Good one. But Naure's law cannot change. Chuha aur billi sath rah nahi sakte. hum abhi shayad itna neeche nahi gir chuke ki chuha billi ke rishte me bhi manavta dhundhni pare.
Still it is good. There is always a dog for a cat. We pay for what we have earned. Here only. And immediately.
Love.

रवीन्द्र गोयल् said...

Thank you. I think we can't stop just because it's not happend. Atleast we can try, we can hope and can do what ever we can do for well.

regards